Search

भाषा, संविधान के नियम

भाषा , संविधान के नियम , साइमन फ्रेजर युनिवर्सिटी के प्रोफेसर अंविता अब्बी जी के लेख-


[ संविधान में अइसन कुल्ह नियम कानून बा कि सरकार भारत के कवनो भाषा के बिना आठवा अनुसूची के , शिक्षा , व्यवसाय , रोजगार आ बाकी जगह प्रयोग में ले आ सकेले । संविधान के भाषा रहला ना रहला के बादो कवनो सरकार अपना किहाँ कवनो स्थानीय भाषा के शिक्षा में शामिल क सकेले । एह आर्टिकल में हमनी के पढब जा अंविता अब्बी जी के ओह आर्टिकल के जवना में उहाँ के लिपि ना रहला के वजह से सरकारी मान्यता ना मिलला के वजह से भाषाई मौत के बात क रहल बानी ]


संविधान : आर्टिकल '350 अ' आ आर्टिकल 347 : स्थानीय भाषा में प्राइमरी शिक्षा आ भाषा के संवैधानिक मान्यता


संविधान में भाषा के एगो अष्टम सुची बा जवना में भोजपुरी के शामिल करे के मांग पिछला 70 बरिस से कइल जा रहल बा । बाकिर उ सुची , संविधान में शामिल हो गइल भाषा सभ के । त संविधान का कहत बा भारत के स्थानीय भाषा खातिर ? संविधान के मूल भाव देखीं त स्थानीय भाषा में प्राइमरी शिक्षा दिहल जा सकेला , भले उ भाषा होखे बोली होखे आ भले उ संविधान में ना होखे । इहे ना संविधान कवनो राज्य के भा ओह राज्य के कवनो हिस्सा वाला भाषा के राष्ट्रपति के माध्यम से मान्यता दे सकत बा जेकर नीमन नीमन संख्या में जनसंख्या होखे आबादी होखे लोग होखे ।


PART XVII


CHAPTER IV.-SPECIAL DIRECTIVES


350A. Facilities for instruction in mother-tongue at primary stage.-


It shall be the endeavour of every State and of every local authority within the State to provide adequate facilities for instruction in the mother-tongue at the primary stage of education to children belonging to linguistic minority groups; and the President may issue such directions to any State as he considers necessary or proper for securing the provision of such facilities.


माने भइल कि-


इ हर सरकार , राज्य आ स्थानीय प्रशासन के जिम्मेवारी बा कि प्राईमरी स्तर प हर राज्य में मातृभाषा में पढे पढावे के बेवस्था होखे । आ राष्ट्रपति अपना ओर से कवनो सरकार भा राज्य के प्राईमरी स्कुल में मातृभाषा में पढावे खाति जरुरी बेवस्था खातिर आदेश दे सकेलन ।


एगो अउरी क्लाज बा , जवन आर्टिकल 347 में बा । रीजनल लंग्वैज यानि की क्षेत्रीय भाषा के ले के । जदि राज्य चाहत बा कि ओकरा राज्य के कवनो भाषा के आधिकारिक मान्यता मिलो त राष्ट्रपति एह के स्वीकार क सकेले ।


PART XVII


CHAPTER II.-REGIONAL LANGUAGES


347. Special provision relating to language spoken by a section of the population of a State.-


On a demand being made in that behalf the President may, if he is satisfied that a substantial proportion of the population of a State desire the use of any language spoken by them to be recognised by that State, direct that such language shall also be officially recognised throughout that State or any part thereof for such purpose as he may specify.


भाषा के ले के संविधान में आर्टिकल 343 से आर्टिकल 351 तकले काफी जानकारी दिहल बा जवन के रउवा सभ पढ सकेनी ।

संविधान : आर्टिकल 350 ब : भाषा के रक्षा खातिर विशेष अधिकारी

संविधान में हर भाषा के बेहतरी के उपाय दिहल बा । चुकि भाषा के ले के बहुत ही संवेदनहीन देस ह भारत एह से केहू के भाषा के ले के कवनो गरज ना रहेला । संविधान के हिसाब से आर्टिकल 350 ब के हिसाब से राष्ट्रपति कवनो माइनारिटी भाषा खातिर स्पेशल आफिसर ( विशेष अधिकारी ) नियुक्त क सकेले । इ अधिकारी विलुप्त भा गायब भा खतम हो रहल भाषा प काम करिहे आ आपन रिपोर्ट दुनो हाउस ( लोकसभा, राज्य सभा ) में रखिहे। इहे ना ओह राज्य के सरकार के भी एह से जु‌डल जानकारी दिहें ।

एह आर्टिकल के उद्देश्य भारत के हर भाषा के संरक्षण आ विकास ह ।


(1) There shall be a Special Officer for linguistic minorities to be appointed by the President.


(2) It shall be the duty of the Special Officer to investigate all matters relating to the safeguards provided for linguistic minorities under this Constitution and report to the President upon those matters at such intervals as the President may direct, and the President shall cause all such reports to be laid before each House of Parliament, and sent to the Governments of the States concerned.]


पदमश्री विजेता आ साहित्य अकादमी के मौखिक आ आदिवासी भाषा केंद्र के डाइरेक्टर , साइमन फ्रेजर युनिवर्सिटी के प्रोफेसर आ भारतीय लिंगुइस्टिक सोसाइटी के अध्यक्ष अंविता अब्बी जी लिखत बानी कि -


" भारत मे अधिकतर जनसंख्या अपना भाषा मे लिख ना सकेले काहेँ कि ओकरा भाषा में पढाई लिखाइ नइखे । इहे कारण बा कि गांवन मे ओजुगा के स्थानीय भाषा में पढाई नइखे होत जवन चिंता के बिषे बा । "


[ a sizeable population cannot read or write because their languages were never represented in any road map of education. Could this be why we have been unable to provide primary education to rural children in their mother tongues? ]


" भारत मे एह समय 1635 गो भाषा बाड़ी स जवन मुख्य रुप से 7 गो प्राचीन भाषा से निकलल बा‌डी स । एह मे सबसे बड़ बात बा कि अधिकतर भाषा खालि वाचिक परम्परा यानि को बोले बतियावे वाली रुप में बाड़ी स । "


[ As of today, there are 1,635 languages, belonging to seven different language families, spoken in the country. However, a large number of these are preserved and sustained in oral forms. ]


अपना लेख मे अंविता अब्बी जी बहुत जोर दे के कहत बानी कि प्राईमरी शिक्षा केंद्र आ राज्य सरकार के ओजुगा के स्थानीय भाषा आ ओह खाति तइयार लिपि में करे के चाहीँ । इ बहुत जरुरी बा ।


Both state and central governments can take up necessary policy measures to change this. States need to implement the following steps, as quickly as possible:


Developing appropriate scripts for languages of minority communities for imparting primary education in mother tongues.


एगो अउरी जरुरी बात किओर इशारा हो रहल बा कि कानून के भाषा जदि भारत के स्थानीय भाषा में नइखे तब तक कोर्ट के फैसला बराबरी के फैसला में ना गिनाई । ज्युडिसरी नीमन - बाउर के परिभाषित ना करेला बाकिर जदि स्थानीय भाषा में कानून काम करे, वादी भा केस मुकदमा करे वाला आपन बात सही से राख सकेला ।


Another consequence of unscripted languages is that they find no place in our judicial system. Assuring equal justice is possible if these communities are able to voice their concerns in their own language, which in turn requires literacy in their respective languages.


संविधान के धारा 350 अ के रेफरेंश देत कहल गइल बा कि -

इ हर सरकार , राज्य आ स्थानीय प्रशासन के जिम्मेवारी बा कि प्राईमरी स्तर प हर राज्य में मातृभाषा में पढे पढावे के बेवस्था होखे ।


“It shall be the endeavour of every State, and of every local authority within the State, to provide adequate facilities for instruction in the mother-tongue at the primary stage of education to children belonging to linguistic minority groups.”


भारत मे सबसे बड़ बात बा कि मातृभाषा के बात त होला भाषा के बात त होला बाकि लिपि के बात ना होला । ध्यान दिहल जाउ त आजादी के पहिले देश में भाषा खाति ना नागरी लिपि जवन बाद में देवनागरी लिपि खाति आंदोलन भइल बाकायदा लिपि के नाव प नागरी प्रचारणी संस्था बनल रहे । लेख में अंवति अब्बी के कहनाम बा कि -


सरकार के ओर से जतना जल्दी हो सके ओतना जल्दी एगो " नेशनल कमिशन फार इंडियन स्क्रिप्ट्स " नाव के संस्था बनावल जाउ जवना के जिम्मे ओह भारतीय भाषा खाति लिपि तइयार करो जवन भाषा बोलात त बाड़ी स बाकी लिखात नइखी स ।


The need of the hour is the setting up of a ‘National Commission for Indian Scripts’, which will be responsible for scripting unwritten languages.

0 views

आखर 

final aakhar logo PNG_edited.png