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भोजपुरी के वर्तमान काल / आधुनिक काल : भाग -2



हमरा कबो कबो लागेला कि भोजपुरी चुकि लोकभाषा ह एहि से अधिकतर साहित्यकार लो इ मान के चलेला कि लोक भाषा में जब आज के जुग में केहू सिरजन करत बा त ओह के लोके में राखल जाउ जबकि हिंदी अंग्रेजी आ साहित्य में स्थापित भाषा के रचनाकार के नाव मिलेला । लोकगीत यानि कि गढाइल गीत । लोग एक दुसरा से कुछ लेत एगो सिरजना कइल जवन पीढी दर पीढी समाज में बंटात छिटात चल जाला आ उ अगिला पीढी खातिर फेरु से जाम जाला । यानि कि लोकगीत जामेला , बढेला , पनपेला , पनकेला आ फइलेला । हम पढत रहनी ह त मालूम चलल ह कि डा. कृष्णदेव उपाध्याय जी अपना ' भोजपुरी ग्राम्य गीत ' में कुछ एक रचना साहित्यकार लो के भी रखले बा‌डे जवन लोक से ना ह बाकिर लोकभाषा में बा । इ बात सही बा कि आज के समय में कुछ लोग हिन्दी कविता के लमड़ाई के भोजपुरी बना देत बा कुछ लोग लोक के गीत में आपन नाव आ कुछ एक फुहर शब्द जोड़ घटा के बड़का गीतकार बन जाता , बाकिर एहू के अलावा कुछ लोग बा जे शिष्ट साहित्य के रुप में भोजपुरी भाषा खातिर योगदान दिहल बाकिर ओकर सही से मुल्यांकन ना भइल आ नतीजा लोक के शिष्ट साहित्य के भी लोके मानल गइल ।


भारत जीवन प्रेस बनारस , हाबड़ा प्रेस कलकत्ता , खड़गविलास प्रेस पटना से भोजपुरी भाषा में / खातिर कतना किताब प्रकाशित भइल रहली स एकर कवनो सही रेकाड केहू के लगे नइखे । साहित्य के मुल्यांकन ओह किताबिन के मुल्यांकन के आधार ही भोजपुरी भाषा आ साहित्य के भविष्य के निर्माण करी । भोजपुरी भाषा आ खास क के भोजपुरी भाषा के समग्र साहित्य प जवन शहरी लोग शिष्ट साहित्य कहेला ओह हिस्सा प पुरहर काम ना लउके आ इहे सबसे बड़ वजह परि जाला कि एलीट वर्ग भोजपुरी से कुछ कोस के दुरी बना के राखेला ।


भोजपुरी में बिरहा लोक में रहे बाकिर शिष्ट साहित्य में बिरहा आजमगढ से बेसी लउकेला । बिरहा के शिष्ट साहित्य में ले जाये वाला , रज्जाक मियाँ रहले । घसियारे कवि मिट्ठू के गुरु रहनी रज्जाक जी । आजमगढ के मुबारकपुर के रहनिहार रज्जाक जी मजूर रहनी बाकिर भोजपुरी गीत कविता के सिरजना करत रहनी । रज्जाक जी के लिखल ऋतु गीत , एगो मजूर के कलम से -


बड़ी नीकि हउ मोरी माता हो गरमिया

देहलु कुछ दिन चिन्ता मोर बिसार ।

चिथड़ा से तनवा कइसे ढकबै हो मइया

आवे जाड़ा दुसमनवा हमार ॥

हमरे ले नीक उ तs हउवे भिखमंगवा

जे सोवत होइहें दुनो टंगिया पसार ॥

भादो के अन्हरिया में पनिया में भींजो

तउने जरत बाटे पेटवा हमार ॥


भोजपुरी हरमेसा से प्रतिरोध के भाषा रहल बिआ । एह भाषा के हर विधा में कम से कम दू गो भाव लउकेला , विरह आ प्रतिरोध । आ भोजपुरिया समाज एह दुनो भाव के लोक में गीतन के माध्यम से बहरी ले के आवेला । जंतसार से ले के रोपनी सोहनी तक के गीत , खाली विरह ही ना बलुक खीस के आग के बहरी ले आवे के एगो माध्यम बन जाला , कबो टिबोली कबो गाभि कबो सटायर के रुप में । ओइसहीं प्रतिरोध के गीत सोझा लउकेला ।


गांधी के चम्पारण आवे से पहिले के बात ह , पकड़ी आम ( चम्पारन ) के निवासी रहनी शिवशरण पाठक जी । निलहा लोगन के ओह घरी बड़ा अत्याचार रहे । ओहि प शिवशरण जी एगो कविता बेतिया महाराज के जा के सुनवनी । कविता के असर भइल बाकिर बेतिया महाराज नीलहा लोगन के चम्पारन से हटा ना पवले । पाठक जी के गीत रहे -


राम नाम भइल भोर गाँव लिलहा के भइले

चँवर दहै सब धान गोएड़े लील बोअइले ॥

भइ भैल आमील के राज प्रजा सब भइले दुखी

मिल-जुल लूटे गाँव गुमस्ता हो पटवारी सुखी ॥

आसामी नाँव पटवारी लिखे, गुमस्ता बतलावे

सुजावल जी जपत करसु, साहब मारन धावे ॥


इ गीत पाठक जी , बेतिया महाराज के दरबार में सुनवले रहले , बेतिया महाराज कुछ कोशिश कइले बाकिर कुछ भइल आ बाद त इतिहासे बनल बाकिर ओह इतिहास से पहिले के इ गीत ।


मिट्ठू कवि के चर्चा एहि लेख में रज्जाक मियाँ के संगे भइल रहल ह । जइसे रज्जाक मियाँ मजूर आदमी रहले ओइसहीं उनुकर चेला मिट्ठू कवि । मिट्ठू कवि के दू गो किताब प्रकाशित भइल रहे । दुनो प्रबंध काव्य आ दुनो के नाव रहे ' दयाराम का बिरहा ' आ दुसरकी किताब ' हंस-संवाद ' । दयाराम के बिरहा , दयाराम नायक के संघर्ष के कहानी ह , कल-छपट प्यार के कहानी ह गरीब के कहानी आ एहि कहानी के अगिला हिस्सा दयाराम के बेटा टुन्नू के कहानी ह । एक तरह से लोकगाथा के रुप में एगो प्रबंध काव्य ह जवना के शैली बिरहा के बा । हंस-संवाद , प्रबंध काव्य जवन विरह-रुपात्मक ह , एकर सिरजना तब भइल रहे जब मिट्ठू कवि घांस गर्हत रहले । घांस गर्हत घरी विरह के भाव आइल आ एह किताब के सिरजना भइल जवना में नायक कलकत्ता में रहत बा आ विरहणी हंस के माध्यम से आपन सनेश भेज रहल बाड़ी । यानि कि हंस एजुगा बटोही के काम क रहल बा । आ एह किताब के प्रकाशन भले बाद में भइल होखे बाकिर हंस के गीत के गवनई मिट्ठू कवि के माध्यम से पहिले से हो रहल बा । भिखारी ठाकुर के रसूल मियाँ के आवे से पहिले । हंस के गीत एक तरह से लोकगाथा से प्रेरित बा बाकिर विरह के गीत अदभुत आ करेजा काढ देबे वाला बा ।



संवत उनइस सै बीस के फगुनवा

राति अन्हरिया रहल मँगर के दिनवा

हंसराज के बेटा ' मिट्ठू ' हउवै गुजरवा

रज्जक के चेला गइले पेढी के बजरवा ।


कहे मिट्ठू सुरसती के मनाय के

कछु हमहू के द तु गियान

लगली बदरिया छिलत रहले घसिया

आइल दिलवा में तब फेके एक बतिया

बिरहा बनावे हो मिट्ठू दिनवा हो रतिया

हमहू के द तु गियान

कहे मिट्ठू सुरसती के मनाय के।



गोरी रहे उमिर के थोरी

जोहे बालम के आस ।

जोहे ले आस ओकर लागल बा अनेसा

मारे सोकियन के ओकर फाटल करेजा

गइल छितराय हो गइल रेजी-रेजा

जेही बालम की आस ।

फूल कुम्हलाइ जात बा बेइल के

कहिया भँवरा अइहें पास ।


आज के एह भाग के अंतिम पोस्ट एगो खुबसुरत बारहमासा के लेखक जोगनारायण ' सुरदास ' जी के परिचय आ ओह बारहमासा के से । जोगनारायण जी के लेखन शैली बता रहल बिआ कि इहाँ के गोरखपुर क्षेत्र के ओर से बानी । इहाँ के अउरी रचना होइ अइसन अंदेशा बा बाकिर कुछ एक रचना इहाँ के अलग अलग प्रकाशित भइल बा । चुकि इ बारहमासा हमरा बहुत प्रिय आ अपने आप में तनि अनोखा लागल ह एह से एह लेख में जोगनारायण जी के ले के अइनी ह ।


प्रथम मास आषाढ हे सखि साजि चलल जलधार हे ।

एहि प्रीति कारण सेत बाँधल सिया उदेश सिरी राम हे ॥

सावन हे सखि सबद सुहावन रिमझिम बरसत बुन्द हे ।

सबके बलमुआ रामा घरे-घरे अइले हमरो बलमु परदेस हे ॥

भादो हे सखि रैन भयावन दूजे अन्हरिया ई रात हे ।

ठनका-ठनके रामा बिजुली चमके से देखि जियरा डेराय हे ॥

आसिन हे सखि आस लगावल आस ना पुरलs हमार हे ।

कातिक हे सखि पुन्य महिना करहु गंगा असनान हे ।

सब कोइ पहिरे रामा पाट-पितम्बर हम धनि गुदरी पुरान हे ॥

अगहन हे सखि मास सुहावन चारो दिस उपजल धान हे ।

चकवा-चकैया रामा खेल करत है से देखि जिया हुलसाय हे ॥

पूस हे सखि ओस परि गइले भींजी गइले लम्बी-लम्बी केस हे ।

चोलिया भीजेले जे करबि कि हम जोबना मिले अनमोल हे ॥

माघ हे सखि ऋतु बसंत आइ गइले जड़वा के रात हे ।

पिअवा रहितन रामा जो कोरवा लगइतो कटत जाड़ा ई हमार हे ॥

फागुन हे सखि रंग बनायो खेलत पिया के जे संग हे ।

ताहि देखी मोर जियरा जो तरसे काउ उपर डारू रंग हे ॥

चैत हे सखि सभ बन फूले, फुलवा फूले जे गुलाब हे ।

सखि फूले सभ पिया के संगे हमरो फूल जे मलीन हे ॥

बैसाख हे सखि पिया नही आवे बिरहा कुहुकत मेरी जान हे ।

दिन जो कटे रामा रोवत-रोवत कुहुकत बिते सारी रात हे ॥

जेठ हे सखि आवे बलमुआ पूरल मन के आस हे ।

सारी दिन सखि मंगल गावति रैन गँवाये पिया संग हे ॥

' जोग नारायन ' गावे बारहमासा मिता जी लेना विचार हे ।

भूल चूक में से माफ कीजै पुर गइल बारह मास हे ॥


भोजपुरी भाषा में सिरजना खातिर सहित्य निर्माण खातिर लोग आपन खेत मकफूल राखि देले बा , लोग बड़ा पसेवा से भोजपुरी के हजारन साल से लगातार पोढ आ गोट क रहल बा । हमनी के अपना जुग में अपना मातृभाषा भोजपुरी में लिखे के चाहीं , भोजपुरी किताबिन के पढे के चाहीं । भोजपुरी में लिखे पढे के चाहीं । भोजपुरी के साहित्य के कम रोजगार शिक्षा के दरकार बा । रउवा हम मय भोजपुरिया लिखिहें तबे इ संभव बा ।



एह लेख के लिखे में सहजोग मिलल बा -


डा. उदय नारायण तिवारी : भोजपुरी भाषा और साहित्य

डा. कृष्णदेव उपाध्याय : भोजपुरी और उसका साहित्य

डा. अर्जुन तिवारी : भोजपुरी साहित्य के इतिहास

दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह : भोजपुरी के कवि और काव्य

गूगल / कुछ पत्रिका

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