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भोजपुरी के वर्तमान काल / आधुनिक काल : भाग -1


पलायन काल भा नवजागरण काल के उमिर 1900 ले पहिले के लेख में देखावल बा । पिछला काल के रीतिकाल कहे प बहुत लोगन के आबजेक्सन रहल बा काहें रीतिकाल मूल रुप से हिंदी के आधारप दियाइल बा जबकि एह काल में भोजपुरिया माटी क्रांति के लकीर घींचले रहे। एहि काल में भोजपुरिया माटी से पलायन भइल रहे । एह काल के अंत में भोजपुरी के पहिला गजल रचनाकार तेग अली तेग के गजल संग्रह प्रकाशित भइल रहे । भोजपुरी के पहिला नाटक ' देवाक्षर चरित ' एहि काल के ह । बाकिर इहो बा कि जवना समय भोजपुरी के पहिला गजल संग्रह के बुनियाद धरात रहे , जवना समय देवाक्षर चरित जमीन प उतरत रहे ओहि समय में भोजपुरी भाषा आ साहित्य के तीन गो बहुत बेजोड़ खाम्हा के एह माटी प जनम भइल रहे । महेंदर मिसीर , रघुबीर नारायण आ भिखारी ठाकुर के आगमन के समयकाल रहे ।


नवजागरण काल के अंतिम समय आवत आवत भोजपुरी साहित्य लोक आ शिष्ट साहित्य के दू गो राहि ध ले ले रहे । लोक के सागर त अथाह आ ओकर थाह लगावल आजुओ सम्भव नइखे बाकिर लोक के बुनियाद प भोजपुरी में शिष्ट साहित्य के सिरजना शुरु हो गइल रहे । त सन 1900 से अब तक के सफर के अलग अलग हिस्सा में देखावे के कोशिश होइ । अइसे त भोजपुरी के पिछला 119 साल के साहित्यकार लोगन के लिपिबद्ध कइल हमरा खातिर असम्भव बा बाकिर तबो खास-खास जानकारी के जुटावे के कोशिश क रहल बानी । अइसन नाव के राखे के कोशिश होइ जवना नाव के पापुलरिटी भा चर्चा कम बा ।


गोरखपुर /देवरिया ( मझौली ) के महाराज खड्गबहादूर मल्ल ( लाल ) भोजपुरी , हिंदी आ ब्रजभाषा के साहित्यकार रहनी । इहाँ के भोजपुरी में कजरी संग्रह ' सुधाबुँद ' लिखले रहनी । सिंगार रस के पाग में बुड़ल लाल जी उपनाम से आपन रचना लिखत रहनी ।


परदेसिया के प्रीत जइसे बदरा के छाँहि ।

प्रीति लगा के निरबाह करत नाहि , नाहक पकरे बाँहि

लाल चार दिन नेह लगा के दाग देत जिय मांहि ॥

परदेसिया के प्रीत जइसे बदरा के छाँहि ॥


पिया निरमोहिया नाहीं आवे रे भवनवा रामा,

रहि रहि आवेला झवनवाँ रे हरी ।

काहे मोरे अँचरा से तें जोरले रे दमनवा रामा,

केहि कारन ले अइले गवनवाँ रे हरी ।

चढली जवनियाँ दूजे बहेला पवनवाँ रामा

तीजे जियरा मारेला सवनवाँ रे हरी ।


आये रे सवनवाँ नाहीँ आये मन-भवनवाँ रामा

जोहते दुखाली दुनो अँखिया रे हरी ।

केहू ना मिलावे उलटे मोहे समझावे रामा

दुख नाही बुझें प्यारी सखिया रे हरी ।

केहि बिधि जाई उड़ि पिया के मैं पाई रामा

उड़लो ना जाये बिना पँखिया रे हरी ।


बाबू रामकृष्ण बर्मा ' बलबीर' जी बनारस के रहे वाला रहनी । तेग अली तेग के किताब ' बदमाश दर्पण ' के सम्पादन क के प्रकाशित करावे के श्रेय बलबीर जी के ही जाला । भारत जीवन प्रेस से बलबीर जी के लिखल किताब ' बिरहा नायिका भेद ' प्रकाशित भइल रहे । बलबीर जी के कविता सिंगार अंतिम सीमा तकले चहुंपल बा ।


इहें के लिखल ह -


लजिया दबावे मनमथवा सतावे मोसे, एको छन रहलो ना जाय ।

लखि 'बलबिरवा' जमुनवा के तीरवा री हियरा के धिरवा नसाय ॥


बुलाकीदास , बलिया के रहे वाला संत कवि रहनी । बलिया आ आसपास के क्षेत्र में बुलाकी दास , बुलाकी बाबा के नाव से जानल जात रहनी । इहं के भक्ति गीतन के प्रस्तुति बरबस जनता के अपना ओर घींच लेत रहे । इहाँ के लिखल गीत के अंश -


छोटी-मुकि ग्वालिनि सिर ले मटुकिया , हो रामा चलि भइली ।

गोकुल सहर दहिया बेचन , हो रामा चलि भइली ॥


महाराजकुमार श्री हरिहरप्रसाद सिंह जी , शाहाबाद के रहनिहार , परमार वंश के रहनी आ इहाँ के ब्रज आ भोजपुरी में तकरीबन पांच गो से बेसी किताब के रचना कइले बानी । ' नखसिख, हरिहर शतक , अस्मरनी / बिस्मरनी , अस्फुटावली , षटपदावली ' नाव से पांच गो किताब लिखले बानी । इहाँ के बेटा महाराजकुमार गिरिजाप्रसाद सिंह जी भी साहित्यकार रहनी । इहाँ के लिखल एगो भोजपुरी कवित्त -


लवलीं ना मन केहू देवन के अराधे में

सधलीं ना मंत्र-तंत्र तीरथ ना नहैली हम ।

नाहीं देलीं कान कबो कथा ओ पुरानन में

एको बेर रुकि के ना हरि गुन गवलीं हम ।

नेलीं ना नाम कबो ध्यान कइलीं ना जाम में भी

ऐसन विधि नाम काम कवनो ना अइलीं हम ।

एक प्रभु चरन सरोज रति पवले बिना

विसय लुभाइ हाइ समय बिलवलीं हम ॥


जपलीं ना जाप सत बरत ना कइलीं कबो

जो जग्य दान में ना रति उपजवलीं हम ।

छवलीं ना कुटी वन , जल में ना सैन कइलीं

तापन में तप के भी तन ना तपवलीं हम ।

तिरपति ना कइलीं तर्पन से पितरन के

देके पिण्ड-दान गया रिन ना चुकवलीं हम

एक प्रभु चरन सरोज रति पवले बिना

विसय लुभाइ हाइ समय बिलवलीं हम ॥


पण्डित बेनीराम मूल रुप से काशी के रहे वाला भारतेंदू जी से पहिले के साहित्यकार यानि कि बीसवा शताब्दी के पहिले के रचनाकार बाकिर हम इहाँ के बीसवा शताब्दी में एह से रखले बानी काहें कि इहाँ के एगो रचना , समय से काफी आगे आ ' बिदेसिया ' शैली के गीतन के आधार दे रहल बा । मूल रुप से इहाँ के लिखल रचना-संग्रह त कहीं नइखे संकलित बाकिर , भारतेंदू जी के किताब ' हिन्दी भाषा ' में कजली संग्रह में , पण्डित बेनीराम जी के एगो कजरी मिलल बा जवन बिदेसिया प बा -


काहें मोरी सुधि बिसरावे रे बिदेसिया

तड़पि - तड़पि दिन रैना गवायों रे

काहें मोसे नेहिया लगाये रे बिदेसिया

अपने त कूबरी के प्रेम भुलाने रे

मोह लिख जोग पठाये रे बिदेसिया

जिन सुख अधर अमी रस पायो रे

तिन विष पान कराये रे बिदेसिया

कहै बेनी राम लगी प्रेम कटारी रे

उधोजी को ज्ञान भुलाये रे बिदेसिया ।


[ नोट : एह रचना के समय काल , 1887 यानि कि भिखारी ठाकुर जी के जनमकाल से बहुत पहिले के ह । बाकिर एह रचना के लोक से शिष्ट के ओर आवे के छटपटाहट के रुप में देखल जा सकेला ]


कवि टाँकी जी अइसे त गया के रहनिहार रहनी बाकिर इहाँ के लिखे के शैली से लागत बा कि मूल इहाँ शाहाबाद के आस-पास के रहनी । भाँट कवि रहनी , यायावरी रहे । इहाँ के लिखल एगो रचना जवन रेलगाड़ी प बा आ बिहार में जब नया-नया रेलगाड़ी आइल रहे ओह घरी इहाँ के लिखले रहनी , बहुत होट रहे -


चलल रेलगाड़ी रँगरेज तेजधारी

बोझाए खुब भारी हहकार कइले जात बा ।

बइसे सब सूबा जहाँ बात हो अजूबा

रँगरेज मनसूबा सब लोग के सुहात बा ।

कहीं नदी अउर नाला बाँधे जमुना में पुल

कतना हजार लोग के होत गुजरान बा ।

कहै कवि टाँकी बात राखि बाँधि साँची

हवा के समान रेलगाड़ी चलि जात बा ।


सुन्दर वेश्या , इनिकर चर्चा एने खुब भइल ह , खास क के जब से लोकगायिका चंदन तिवारी के आवाज में सुंदर वेश्या के गीत लोग सुनल ह तबसे कुछ बेसी चर्चा भइल बा ।


मिरजापुर कइला गुलजार हो ,

कचौड़ी गली सुन कइला बलमू


एह गीत के लेखिका सुन्दर वेश्या हइ । सुन्दर आ नागर पहलवान के भाई-बहिन के चर्चा खुब रहे । सुंदर , एक से बढ के एक गीत लिखले बा‌डी । जइसे -


अरे रामा नागर भैया जाला कालापनियाँ रे हरी

सभके त नैया जाला कासी हो बिसेसर रामा

नागर नैया जाला कालापनियाँ रे हरी ।


अम्बिका प्रसाद , जी मूल रुप से शाहाबाद के रहे वाला रहनी बाकिर इहाँ के जमींदारी सारन जिला ले रहे । अम्बिका प्रसाद जी के बहुत सारा रचना , सर जार्ज ए ग्रियर्सन , अलग अलग अंग्रेजी पत्रिका में प्रकाशित करवइले बानी । भारतेंदू जी के किताब हिंदी भाषा में अम्बिका जी के परिचय आ रचना मिलेला ।


पहिले गवनवाँ पिया माँगे पलँगिया चढि बोलावे ले हो

ललना पिया बान्हे टेढी रे पगरिया त मोरा नाहीं भावे हो ।


उपर दिहल गीतन के जदि पसार के देखल जाउ त लोक के तुकबंदी से निकल के उपमेय उपमान अलंकार आ व्याकरण के ओर बढत इ कुल्ह रचना , भोजपुरी साहित्य जगत में लोक के समानांतर आ लोक के संगे संगे भोजपुरी के भाषाई बेवहार के अदभुत उदाहरण दे रहल बाड़न स । ध्यान देबे जोग बात बा कि एह में जतना रचनाकार के बारे में लिखल बा उ मय के मय लो ना खाली 1900 से पहिले के ह लो बलुक ओह लो में से अधिकतर रचनाकार के रचनाकाल भी 1900 के पहिले के बा । भोजपुरी भाषा के संवैधानिक मान्यता ना मिलला के बादो , राजाश्रय ना रहला के बादो , पचखा लेखा ना बलुक जोरदार बरिआर सोर के आधार प अपना आप के बरिआर करत भोजपुरी भाषा आगे परी बढ रहल बिआ । जरुरत बा भोजपुरिया लोगन के भोजपुरी में लगातार लिखे पढे बोले आ लिखल पढे के होइ तबे भोजपुरी के बेहतरी हो सकेला ।

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आखर 

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