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छठ पर्व

कुछ त बात बा ओ कतार में, अन्हार में असमान से कोई देखित त ओकरा लागित कि दीयरी के पांत बा जे आगे बढ़ल चलल जाता. दऊरा पर जरत दिया लेके लऊटत लोग केतना उत्साह में रहेला इ शब्द मे बतावल कठिन बा. हमरा ला वईसे इहो बतावल कठिन बा कि छठ काहे मनावल जाला, चाहे एकर पौराणिक भा सामाजिक संदर्भ का बा. लेकिन छठ एगो अईसन परब या मौका बा हमरा लेल खासकर जे हमरा आपन लोग आपन समाज से जुड़े के मौका देलक आ हर साल देवेला. हमरा लेल छठ बहुत दिन तक एगो पर्व से अधिक ना रहे. छुट्टी होखे गांवे जाई जा छठ हो जाये. दऊरा उठावे वाला उमर ना रहे लेकिन भार ले जाईं. घाट पर जा के लोक के मुंह देखी कोई ना चिन्हे ना कोई के हम चिन्हीं. छोट भईला के नाते सब लोग से बात भी ना हो पावे. पापा जेकरा के कह देस ओकरा के गोड़ लाग ली कुछ लोग रहे जे हाल चाल पुछे. छठ के मायने जिंदगी में तब बदलल जब हमनी गांव के छवारिक में गिनाये लगलीं आ पानी लगला के चलते पारंपरिक रास्ता के असुविधाजनक भईला के चलते नया रास्ता साफ भईल. ओमे लगली. गांव के काम करे में बड़ा आनंद आईल. लोग भी चिन्हे लागल आ गांव के लोग से बातचीत होखे लागल. ओही साल गांव के कुछ लोग साथे मिलकर ड्रामा कईनी. जेमें बहुत उत्साही भूमिका निभईनी. पर्दा से बाहर आ पर्दा से भीतर भी. एकरा बाद कुछ पहचान बनल. लेकिन इ हम आपन राग काहे अलाप तानी. बात त छठ के करे के बा.

हमनी गांव में बहुत सुंदर छठ होला. वईसे हर गांव में सुंदर छठ होला लेकिन हमार गांव के खासीयत इ बा कि सारा लोग के छठ एक साथे एके तालाब पर होला

गांव के सामाजिक सरंचना कुछ अईसन होला कि हर गांव में कुछ टोला होला. उ टोला के सरंचना अईसन होला कि कभी कभार जाति के आधार पर टोला के विभाजन रहेला(जौन रेणु के मैल आंचल में बा) आ कभी कभार दिशा के आधार पर. एक टोला में भी विभिन्न जाति के लोग रहेला लेकिन ओ लोग के घर एक साथ होई. जैसे मुसलमान टोला में हमरा गांव में ब्राह्मण कुछ घर बा त एही तरे ब्राह्म्ण लोग के टोला में बरई आ यादव लोग. एही तरह हरिजन टोला में जौना के दुष्पट्टी कहल जाला में भी दलित जाति के लोग के जातिगत आधार पर घर बा. एह सारा टोला के लोग एके जगह छठ करेला. लेकिन जाति के हिसाब से घाट के विभाजन रहेला. सब लोग अपना अपना समुदाय के सिरसोप्ता बनईले बा जेकरा लगे बैठ के पुजा होला आ कोसी भराला. छठ के सबसे बड़हन बात हमरा इ लागेला कि एकरा पुजा पद्धति में कौनो विभाजन नईखे जातिगत तौर पर बुरी तरह विभाजित सम्माज में इ समानता के एगो दुर्लभ प्रतिक बा. वैसे इ पर्व के पौराणिक आधार भी बा जैसे कि लोग कहेला कि देवासुर संग्राम में देवता के मदद ला शंकर जी कार्तिकेय जी के उत्पन्न कईले कार्तिकेय जी के पालन छौ गो देवि लोग कईली. इहे देवी लोग के छठी माता के रुप मे पुजल जाला. हमरा एह पौराणिक स्रोत के उतना जानकारी नईखे ऐसे एकरा ला शोध करे के पढी जौन बाद में होई. भारत में अधिकांश पर्व त्योहार खेती से संबंधित पर्व त्योहार ह. सब प्रांत में चाहे उ बिहु हो, ओणम हो या पोंगल हो. बिहार आ उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सा में इही तरह छठ बा. छठ में अर्घा आ कोसी पर नया फ़सल के सब चीज धरल जाला. जईसे गन्न, आदि, निंबु, सुथनी,नारियल इत्यादि. एह सारा फ़सल के पहिला अर्घ एह पर्व में ही पहिले देहल जाल बाद में लोग ओकरा के दैनिक उपयोग में लेवेला लोग. छठ में सुर्य के अर्घ देवे के कारण बहुत कुछ ओकर दैवीय शक्ति में नैखे जेतना ओकर प्राकृतिक शक्ति में. अब इ केकरा मालूम नईखे कि खेती मंल सुरज आ पानी के केतना योगदान बा.

छठ के कुछ और खासियत बा जैसे सब नया पकवान नया चुल्हा पर बनेला. बने से पहिले सब अन्न धो के सुखावल जाला एकरा के पक्षी तक से बचावे के पड़ेला. गेंहु पिसवावे के खतिर चक्की में जाला. चक्की मालिक लोग भी आपन चक्की धोएला लोग. हमरा गांव में त मुसलमान लोग भी आपन आपन चक्की मिल धो लेवे ला लोग आ ओह मिल सब में भी बहुत भीड़ होला. छठ में ‘मानता’ भी मानेला लोग. जईसे एगो मानता मनाला भीख मांगे के. एमें घरे घे जा के भीख मांगल जाला आ भीख में मिलल अन्न भा पैसा से ही छठ के परसाद चढ़ावल जाला. एगो दंड धरे के भी मानता हे, एमें लोग जमीन पर लेट के छठ घाटे तक जाला.

छठ के मतलब होला गांव में लोग के आ पैसा के आगमन. छठ में बहरा कमाय वाला लोग कोसिस करेला गांव चल आवे के. वईसे आधुनिकता के बयार में ऊब डूब करे वाला सुविधा भोगी लोग आब गांव में पर्वो त्योहार में गांवे नईखे आवेके चाहत. चाहे उ गांव् के नजदीक के सहर में काहे ना रहत होखे. गांव के अर्थव्यवस्था में उछाल ले आवेला छठ. बस,जीप, टांगा से ले के सब्जी आ छोट मोट दोकानदारी करे वाला लोग भी नीमन पईसा कमा लेवेला लोग. यथा शक्ति लोग चाहेला कि घर में लईकन से ले के सबका नया कपड़ा होखे जे पहिन के छठ में जाय. छठ के सामान बेचेला विसेस बाजार लागेला. बाजर में दोकान करे वाला लोग सामान हाली हाली बेच के अपना किहां छठ के तैयारी करेला. हजाम के दोकान आ पान के दोकान में त खासे रौनक रहेला. हमरा गांव में छठ के मौका पर नाटक होला एसे युवा दल के हलचल कुछ विसेस रहेला आ दूर जवार से भी लोग नाटक देखे आवेला जे रात भर होला.

गांव मे से कमाय खातिर बहरल लोग में से अधिकांस लोग अब सहर में बसत चल गईल. धीरे धीरे गांव आवल छोड़ देलक. एसे अब छठ घाट पर भीड़ कम होके लागल बा. लेकिन भीड़ कम भईला से छठ के रौनक कम नईखे भईल. हमनी के गांव के छठ घाट पर एगो बहुत पुरान बरगद के गाछ आ पोखरा बा. पोखरा त किनारे बसे वाला लोग के लालच के बोझ सहत सहत सिकुड़त चल जाता. सारा गंदगी ओही मेम जाला आ सेवार से पोखरा भरल बा. पोखरा के बचावे के सरकारी प्रयास कौन होते नईखे आ निजी प्रयास के विफ़ल करे वाला लोग के गांव में कमी नईखे. लोग इ नईखे बुझत कि इ पोखरा के बचावे के मतलब एगो धरोहर के बचावल बा. कहल जाला के बुढ़ लोग के बचा के रखे के चाही काहे कि ओ लोग लगे अनुभव के खजाना रहेला. पोखरा आ बरगद के बचावल ओ अनुभव के बचावल बा.

एही से हमरा लेल छठ के मतलब आ पर्व त्योहार से जादे बढ़ गईल बा. हमरा ला इ गांव, गांव के लोग, पर्यावरण, परंपरा आ बहुत कुछ से जुड़ल हो गईल बा. इ हमरे ला ना हमरा पिढी के बहुत लोग ला बा. छठ में समाज के सारा दिवार तोड़ के लोग एके पानी में खड़ा होला, एके घाट पर जुटेला, एके रास्ता से लौटेला. सोची सब दिन अईसन होईत त केतना निमन होईत.

- अमितेश कुमार





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